21 May 2017

पर्यावरण ले जुरे हमर संस्कृति


प्राकृतिक रूप ले हमर चारों मुड़ा जोन वातावरण हवय इही तो हमर पर्यावरण आए। चराचर जगत के जीव-जनावर के जिनगी के आधार आए पर्यावरण। उत्पत्ति ले विनाश के ओखी, पालनहारी, जीवनदाई हमर पर्यावरण के सरेखा के गुनान करे के अब बखत आगे हावय। पर्यावरण सम हाबे तब तो कोनो गम नइये फेर थोरको उंच-नीच होय म इही पर्यावरण हमर विनाश के कारण तको हो जथे। एक के गिनहा होय ले सबोच के जिनगी खुवार होय के डर अब दुनिया ल सतावत हाबे। इहीच बात ल दुनिया भर के वैज्ञानिक मन चेतावत तको हाबे के अब धीरे-धीरे पर्यावरण के संतुलन बिगड़त हाबे, बेरा राहत कहू चेत नइ करबोन तब न सिरिफ धरती के जीव-जनावर भलूक सउहत धरती तको खुवार हो जही। जल, जंगल, जमीन काहिंच नइ बांचही। ये बात अउ बड़ संसो के आए के जेन जीव ल प्रकृति ह सोचे-समझे अउ गुने के शक्ति दे हावय तेनेच हर ज्यादा पर्यावरण संग खेलाही करत हाबे। ऐसो आराम के जीवन खातिर जंगल के विनाश करते चले आवत हावय जेखर सेती जल संकट विकराल रूप लेवत हाबे। जमीन परिया परत हाबे। अइसने करते-करत एक दिन कुछ नइ बांचही।
अवइया विनाश ल देखत हमर सुजानी सियान मन पर्यावरण ल बचाये खातिर केउ ठन योजना चलावत हाबे। फेर हमन अउ हमर छत्तीसगढ़ ये मामला म बड़ भागमानी हावय काबर के हमर पुरखा मन पर्यावरण के अभिन्न अंग जल, जंगल अउ जमीन ले हमर संस्कृति म जोड़े हाबे। जल, जंगल अउ जमीन ल बचाये खातिर पुरखा मन जेन रीत-रिवाज अउ परंपरा के चलागन शुरू करे हाबे, हमु ल ओकरे निर्वाहन करना हवय अउ अपन अवइया पीढ़ी ल तको धरोहर सहिक धराबो तभे हमर धरा बाच पाही।
संगी हो थोरिक सोरियावव तो हमर सियान मन कइसे परंपरा के आड़ धराके पर्यावरण ल बचाये राखे हाबे तेन ल। सबले आगू रूख-राई के गोठ करन, काबर के सबले ज्यादा नुकसान तो पेड़ के अंधाधुंध कटाई ले पर्यावरण ल होवत हाबे। सास ले खातिर आरूग हवा बर तरसे ल होगे। हवा म पाना-पतेरा, कोहा-पथरा समागे हावय। फेर लोकांचल म शुद्ध वायु के संकट नइये, आजो उहां पावन पुरवाही बोहाथे। येकर सबले बड़े कारण हावय लोगन मन के रूख-राई के प्रति आस्था अउ मान्यता। लोगन मन पेड़-पौधा के पूजा करथे। लोक संस्कृति म केउ ठन अइसन पेड़-पौधा हावय जेन ल काटना पाप माने जाथे। जइसे पीपर पेड़ के बिसय म कहे जाथे कि ओमा भगवान विष्णु के वास होथे। केउ ठन धार्मिक कारज के मउका म पीपर के पेड़ के जड़ म पानी देके शक्कर, गुड़ अउ शहद चड़ाये जाथे। गांव के लोगन मन रोज बिहनिया नहा के पीपर के पेड़ ल पानी देथे, पांव परथे अउ मनौती मांगथे। इही सेती गांव-गांव म पीपर के बड़े-बड़े अउ बड़ जुन्ना-जुन्ना पेड़ हमला देखे ल मिलथे। धार्मिक आस्था के सेती लोगन मन घर के दुवार म पीपर के पेड़ लगाथे। इही रकम ले बर के पेड़ ल तको नइ काटे जाए, न ही जलाउ लकडी के रूप म उपयोग करय। बर, पीपर के लकड़ी के इमरती के रूप म उपयोग तको देखे बर नइ मिलय। बर पेड़ म दाई-बहिनी मन उपास राखके मनौती के डोरी बांधथे अउ पूजा-पाठ करथे। इही बर के छांव म सुघ्घर वट सावित्री के कथा सुने अउ सुनाये जाथे। अइसने डूमर पेड़ के तको बड़ सांस्कृतिक महत्ता हाबे। बिहाव संस्कार के बखत बांस के मड़वा गड़थे, डूमर के मंगरोहन बनाये जाथे अउ सबले पहिली तेल हरदी इही मड़वा अउ मंगरोहन म चड़थे। इही रकम ले ऑवला नवमी के व्रत पूजा म तको ऑवला के पेड़ के गजब विसेस महत्ता हाबे। लोकांचल म जब पेड़-पौधा के प्रति अतेक आस्था अउ प्रेमभाव देखबे तव मन म अइसे भाव उमड़थे के जब तक ये पेड़-पौधा ल पूजे के संस्कृति छाहित रइही तब तक जंगल खतम नइ हो सकय भलूक अउ पेड़ लगाये बर लोगन मन प्रेरित होही। हमर रूख-राई के पूजा पाठ करे के संस्कृति म तो कई ठन अइसन पौधा हावय जेखर औषधि के रूप म गजब उपयोग होथे। जइसे के तुलसी के पौधा। हर घर के अंगना म तुलसी के बिरवा मिलही। महतारी मन बड़ जतन ले अंगना म तुलसी के बिरवा लगाथे, रोज के पानी रूकोथे। संझा बिहनियां दीया बारथे, आरती करथे। हरियर-हरियर तुलसी के बिरवा ले अंगना ह गमकत रहिथे। संगे-संग घर के वातावरण ल तको शुद्ध करत रिथे अउ वायु म आक्सीजन के मात्रा ल बड़ाथे। इही रकम ले पूजा-पाठ म तको फूल पान के विसेस रूप ले उपयोग होय के सेती मोंगरा, दसमत, गोंदा, धतुरा, बेल, दूबी जइसन पौधा सबो के अंगना म महकत रिथे। ये फूल पान तो अब बारो महीना मिले बर धर ले हाबे, कतकोन मन तो येकर व्यवसायिक खेती म लगगे हावय। पाना के सेती संरक्षण ले जुरे पेड़ के चेत करन तव आमा, केरा के अलावा बेल पान घलो विसेस महत्व के हाबे। सावन के महीना म बेलपान के विसेस मांग रिथे। अइसे मान्यता हाबे के सावन के महीना म खास करके सोमवार के दिन भगवान भोलेनाथ ल बेल पान अउ धतुरा चड़ाये म बड़ जल्दी भगवान के किरपा मिलथे। 
लोकांचल म बर, पीपर, आमा, बेल, डूमर जइसन अउ कतकोन पेड़ मन सांस्कृतिक महत्व के सेती तइहा समे ले लोगन के संरक्षण म बाड़त हाबे। जेन गांव के दइहान, गुड़ीचौरा, तरिया पार, डोंगरी-खार म लोगन ल आरूग पुरवाही देवत हाबे। पेड़वा के छांव म सुघ्घर ढंग ले गरमी के दिन म तको लइका मन बांटी, बिल्लस, तिरीपासा, खेलथे। सियान मन ढेरा आंटत बइठे रिथे। अउ ते अउ कतकोन गांव के बइठका इही पेड़ के छांव तरी उरकथे।
अब पर्यावरण के सबले अनमोल धरोहर पानी के बात करे जाय तव ये मामला म छत्तीसगढ़ बड़ सुजानी हावय। इहां के लोगन मन हिसाब लगा-लगाके पानी के हरेक बूंद के उपयोग करे ल जानथे। खेती किसानी के बुता करइया किसान मन बर पानी ले बड़के कुछूच नइये। पानी ले उंकर आजीविका जुरे हाबे। किसान हर वो उदीम करथे जेखर ले ज्यादा ले ज्यादा बरसा होवय। ओमन बरसात के पानी ल संजोए राखे बर तको जानथे। लोकांचल के कृषक मनला जल संरक्षण के गियान कृषि संस्कृति ले मिले हाबे। कुआं-बउली, तरिया-डबरी, डोड़गी-झिरिया, नदिया-नरवा जइसन पानी के स्त्रोत कृषि संस्कृति म पूजनीय हाबे। इतिहास किथे के नदिया-नरवा के तिरे-तिर संभ्यता के उदय होथे अउ पानी के धार ले संस्कृति पल्लवित होथे। ये बात सिरतोन आए। किसान मन पानी के अकारज दूरूपयोग कभू नइ करिन। भलूक पानी ल कोन-कोन से उदीम करके बचाये जाए अउ कइसे उपयोग करै येकरो नवा रद्दा निकालिन। असिंचित खेती म फसल के बने पैदावार ले खातिर नाननान डबरी बनाके बरसात के पानी ल रोके लगिन अउ भू-जल स्तर ल बनाये राखे खातिर बउली बनाइन। पीये के साफ पानी खातिर गांव म सुम्मत के तरिया खोदिन। तरिया डबरी बनाके निस्तारी चलाइये के चलागन सुरू करिन। निस्तारी तरिया म नहावन के नेंग-जोग के संगे-संग मवेशी मन बर तको पीये के पानी के जोखा करिन। वास्तव म छत्तीसगढ़ अइसन राज आए जिहां प्रकृति प्रेम ह आस्थ के संग लोक संस्कृति म जिंदा हावय। इहां के लोक जनमानस म पर्यावरण संरक्षण खातिर कोनो विसेस अभियान चलाये के जरूरत नइये काबर के पर्यावरण के अभिन्न अंग लोगन मन स्वयं अपन आप ल ही मानथे। बइसाख के अंजोरी पाख म तीज के अक्ती ले किसानी के बुता के सुरूआत होथे ये दिन किसान मन जुर मिलके गांव के ठाकुरदेव म दोना-दोना  धान चड़ाके गांव के देवधामी ले अरजी बिनती करथे के एसो घलोक बने बखत म पानी आवय, हमर खेत के छिताय हरेक बीजा म अंकुरण फूटय, कोनो प्रकार के रोग-राई झिन आवय, मवेशी मन बने किसानी म सहायक रइही इही सब अरजी के संकलप करत डीह-डोंगरी के सबोच जुन्ना पेड़ के जर म पानी रूकोथे। बइसाख के लक-लक घाम म बिन पानी के सूखावत पेड़ म पानी रूकोथे किसान अक्ती परब म। तव पेड़ तको किसान ल आसीस देथे। 

नादी, दीया, करसा म चिरई-चिरगुन बर पानी मड़ा के। कचलोइहा धान ले सियानिन दाई के बनाये फाता माने धान के झालर ल आंगना अरो देथे। चिरई-चिरगुन मन अंगना म आथे अउ झालर ले चुन-चुन धान के बाली ल खाथे अउ नांदी के पानी ल पीके उड़ा जाथे। जेठ बइसाख के महीना म जेन मन चिरई-चिरगुन संग मया करथे ओमन भला आन जीव संग कइसे अनित करे सकही। रूख-राई ल देवता, तरिया नदिया ल महतारी कहइया छत्तीसगढ़िया मन जनावर संग मितानी बधथे। हरेली परब म घर-घर लीम के डारा खोच के सावन महीना म रोग-राई ले मनखे अउ मवेशी मनला बचाये के संदेशा देथे। कातिक महीना के देवारी के गोबरधन पूजा ह द्वापर के सुरता देवाथे। ये परब ह गोवर्धन परवत के पूजा अउ गउ वंश के संवर्धन के संदेशा देथे। अइसने अउ केउ ठन परब आथे जेन ह पर्यावरण ले जुरे हावय अउ हमला इही परब संस्कृति ह जल, जंगल अउ जमीन के सरेखा करे के सीख देथे। हमन सियान मनके दिये सीख ल गांठ बांधके अपन-अपन जीवन म अमल म लानबो तभे प्रकृति ह हमर बर जीवनदाई बने रइही। संगे-संग वर्तमान समय म पर्यावरण के बिगड़त स्वरूप के संतुलन बनाये खातिर कुछ नवाचार के तको जरूरत हाबे। जइसे के घर के अंगना म जरूर एक पेड़ लगाना। उपहार स्वरूप कोनो ल भेट देना हावय त ओला आन कुछू कांही देके बजाए ओला फलदार पेड़, ओषधिय पौधा या आनी-बानी के फूल के पौधा देवन। उच्छाह मंगल के बेरा म पर्यावरण ल बचाये के संकल्प धरन। कोनो के जनम दिन, बिहाव या पुन्य तिथि के मउका म एकक पेड़ लगाये के नवा चलागन के सुरूआत के हिरदे ले सुवागत होना चाही। अइसन नवाचार न सिरिफ समाज पर प्रेरणा होही बल्कि वो उपहार म मिले या कोनो व्यक्ति के दिन विसेस के सुरता म लगे पेड़ के फल, फूल अउ सुघ्घर छांव हमला जिनगी भर सुकून देही। 0
- जयंत साहू
डूण्डा, पोस्ट सेजबहार 
जिला रायपुर छ.ग. 9826753304 

31 Mar 2017

छत्तीसगढ़ में सातवां वेतनमान लागू, तभो ले चाय-पानी लेही बाबू? ...

छत्तीसगढ़ विधानसभा के ग्यारहवां सत्र ह इहां के सरकारी करमचारी मन खातिर जबर उच्छाह के रिहिसे। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ह प्रदेश के 2 लाख 60 हजार करमचारी मनला सातवां वेतनमान के लाभ देके घोसना करे हाबे। अवइया वित्तीय वर्ष 2017-18 खातिर विनियोग विधयेक म चर्चा के जवाब देवत सरकार कोति ले मुखिया ह ये एलान करिस हावय। सातवां वेतनमान ले सबो करमचारी मनके तनख्वाह म अब बढ़ोत्तरी ह आयोग के सिफारिश के मुताबिक होना तय हाबे। भारत के सातवां केंद्रीय वेतन आयोग ह वेतन-भत्त अउ पेंशन म 23.55 प्रतिशत बढ़ोत्तरी करे के सिफारिश करे रिहिसे।

सातवां वेतनमान लागू होय के बाद चपरासी मनके तनख्वाह सोलह हजार ले आगर हो जही। उचंहे अधिकारी मन तको पचास हजार के लगभग पगार झोकही। जतेक भी सरकारी विभाग के करमचारी हावय सबोच मन अब 20 ले 50 हजार के बीच म तनख्वाह पाही। जइसे के सरकारी विभाग के बाबू मनके विषय म केहे जाथे के ऊंकर तनख्वाह तो सोज्झे बाचथे, सरी खर्चा अवइया-जवइया मनके चाय-पानी ले निपटथे। केंद्र म मोदी सरकार के बइठते प्रशासनिक ढांचा म मसावट आए हाबे जेकर परिणाम छोटे-छोटे करमचारी मन म तको देखब म आए हाथे। फेर पूरा-पूरा भ्रष्टाचार म लगाम लगे हावय अइसनों नइये। काम ऊरकाना हे तव टेबल के तरी ले कुछ न कुछ देनाच परथे, अइसे विभाग के बाबू मनके कहना हाबे। अब सातवां वेतनमान के आये ले का सरकारी विभाग के करमचारी मन के चाय-पानी लेवइ बंद होही? या फेर काम म अऊ चुस्ती आही। बहुत अकन काम ह ऑनलाइन होय ले खूसखोरी म लगाम तो लगे इहू बात ले इंकार नइ करे जा सकय फेर लेवइया-देवइया हाथ ह एकाक कइसे रूकही, सातवां वेतनमान लागू होवय चाहे दसवां! 
German Chaceller Angela Merkel got 13 per cent of the votes in the global survey to rank second only after the US president.
Kim Jong-nam body 'arrives in Pyongyang'
A van believed to carry the body of late Kim Jong-nam leaves the mortuary of the Kuala Lumpur Hospital, in Kuala Lumpur,
Chinese President Xi Jinping ranked sixth on the list for the most popular leader.
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Floodwaters have inundated the New South Wales town of Lismore. Deaths feared in Australia flood emergency